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बात बराबरी की:क्रांति-क्रांति चिल्लाती औरत हवा में कपूर की तरह इतिहास से गायब हो जाती है, लेकिन इंकलाबी पुरुषों का नाम नहीं मिटता

“राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (NSA) भाग:2 निरोध आदेश बनाने की शक्ति (धारा 3)


सिंघु बॉर्डर! बीते सालभर से ये नाम बचपन की चोट की तरह रह-रहकर डंक चुभोता रहा। कभी यहां कंटीले तार दिखे तो कभी हथियारबंद जवानों की टोलियां। बॉर्डर के उस पार किसान थे, जिनकी कुछ मांगें थीं। लगभग सालभर बाद ‘उस पार’ की जीत हुई। फिलहाल दिल्ली-हरियाणा की सीमाएं जश्न में नहाई हुई है। किसानों की आंखों में आंसू, चेहरे पर मुस्कान और जोश में उनका चिल्लाना, इंसानी किडनी से भी कीमती कैमरे इन पलों को कैद कर रहे हैं। कुछ महिलाएं भी हैं। झुकी कमर वालीं। बुलंद आवाज वालीं। कैमरे के फ्लैश अलग-अलग एंगल से उन्हें भी टटोल रहे हैं, लेकिन करोड़ों औरतें इस जश्न का हिस्सा नहीं। वे आंदोलनकारी पतियों की पत्नियां हैं, या फिर बहन-बेटियां।

सालभर में खेत सूख न जाएं, इसलिए वे मिट्टी गोड़ रही थीं। बॉर्डर तक खाना पहुंचता रहे, इसलिए फसलें उगा रही थीं। ये वे औरतें हैं, जिनके सीने पर न मेडल सजेगा, न इतिहास की काली-सफेद किताबों में जिक्र होगा। ये छूटी हुई औरतें हैं, जिनका काम इंकलाब का इंतजार है।

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